भारतीय संविधान की मूल संरचना न्यायपालिका द्वारा दिया गया न्यायिक सिद्धांत है जो भारतीय संविधान के मूल ढांचे को स्पष्ट करता है तथा इस ढांचे को संसद संविधान संशोधन के द्वारा नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकते यदि ऐसा किया जाता है तो वह कानूनी रूप से निष्प्रभावी होगा।
भारतीय संविधान जब लागू हुआ था तो यह माना गया किस संविधान में संशोधन के संबंध में संसद को असीमित शक्ति प्राप्त है। कालांतर में संविधान संशोधन द्वारा जब नागरिकों के मूल अधिकार प्रभावित हुए तो न्यायपालिका द्वारा इस पर अंकुश लगाया गया तथा इस प्रक्रिया में मूल ढांचे का सिद्धांत विकसित हुआ जिसकी झलक शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ1951 तथा गोलकनाथ वाद 1967 में देखने को मिलती है।
उललेखनीय है कि संविधान की मूल संरचना यानी मूल ढांचे को कहीं पर स्पष्ट रूप से परिभषित नहीं किया गया है फिर भी संविधान में निहित ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान जो संविधान और भारत के राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक आदर्शों को व्यक्त करता है तथा इनमें किसी प्रकार का नकारात्मक बदलाव संविधान को आधारहीन/सारहीन बना देगा संविधान का मूल ढांचा कहलाता है।
संविधान का मूल ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन |
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शंकरी प्रसाद वाद 1951 तथा सज्जन सिंह वाद 1965 |
सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दोनों महत्वपूर्ण वादों में निर्णय दिया गया कि अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है। |
गोलकनाथ वाद 1967
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इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा निर्णय दिया गया कि संसद द्वारा मूल अधिकारों को संशोधित नहीं किया जा सकता। अर्थात सिविधान की कुछ मूल विशेषताएं है जिनमें सामान्य प्रक्रियाओं के तहत संशोधन नहीं किया जा सकता तथा इस हेतु विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता है। |
केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य 1973
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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस वाद की सुनवाई के क्रम में निर्णय दिया गया कि “संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ संविधान के किसी भी भाग को संशोधित या सीमित कर सकती है, किन्तु मूल ढाँचे में परिवर्तन नहीं कर सकती।”
इस वाद में न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय ने संविधान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है 1. संसद की संविधान में संशोधन की शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित हुई। 2. निर्धारित सीमाओं के अंदर यह संविधान के किसी अथवा सभी भागों के संपूर्ण संशोधन की अनुमति देता है। 3. संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करने वाले किसी संशोधन के बारे में न्यायपालिका का फ़ैसला अंतिम होगा। 4. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानंद मामले में दिए गए निर्णय के बाद के दशकों में संविधान की सभी व्याख्याएँ इसको ध्यान में रखकर की गयी। |
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार 1980 |
सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स के मामले में निर्णय देते हुए पुनः उपरोक्त बातों को दोहराया। |
भारतीय संविधान की मूल संरचना का विकास
1975-76 की राजनीतिक स्थिति पर सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि संसद पर अनुचित प्रभाव और नियंत्रण स्थापित कर संसद की सर्वोच्चता के नाम पर शासक वर्ग संविधान के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। अतः शासन की इस शक्ति पर रोक लगाने के लिए “संविधान के मूल ढाँचे की धारणा” को अपनाया जाना चाहिए। इसके बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा समय समय पर अनेक वादों के माध्यम से इस सिद्धांत को और पुष्ट किया गया।
उल्लेखनीय है कि मूल ढांचे के सिद्धांत को कहीं परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों में बताया गया कि “संविधान के मूल ढाँचे” या के अंतर्गत संविधान की कौन-कौन-सी व्यवस्थाएँ आती हैं। संविधान के मूल ढाँचे का सिद्धांत एक गतिशील सिद्धांत है जो न्यायालय की व्याख्या तथा निर्णय के आधार पर स्वरूप ग्रहण करता है जिसमें निम्नलिखित बातें अवश्य आनी चाहिए।
- संविधान की सर्वोच्चता
- शक्तियों का पृथक्करण
- संविधान का लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष स्वरूप।
- भारत की संघीय संरचना
- भारतीय संसदीय प्रणाली
- मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व के बीच संतुलन
- व्यस्क मताधिकार पर आधारित स्वतंत्र चुनाव ।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता ।
उल्लेखनीय है कि संविधान में आधारभूत अवसंरचना को स्पष्ट नहीं किये जाने के कारण इसका निर्धारण न्यायपालिका पर निर्भर है और न्यायपालिका ने अपने विभिन्न निर्णयों में आधारभूत ढाँचे को महत्त्व प्रदान करते हुए कई महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को संविधान के आधारभूत ढाँचे का भाग बताया गया।
न्यायालय के निर्णय एवं संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत का विकास
1973 से मूल ढांचे का सिद्धांत बना हुआ है जिसे न्यायपलिका ने समय समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से पुष्ट करने का कार्य किया है।
- इंदिरा गाँधी मामला- न्यायिक समीक्षा तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ।
- मिनर्वा मिल्स मामला- न्यायिक समीक्षा, मौलिक अधिकारों तथा नीति निर्देशक सिद्धांतों के बीच संतुलन ।
- भामसिंह जी मामला -कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
- इंदिरा साहिनी मामला– कानून का शासन ।
- एस. आर. बॉम्बे मामला -संघवाद, लोकतंत्र, राष्ट्र की एकता और अखंडता तथा सामजिक न्याय जैसी अवधारणा ।
- न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को असंवैधानिक बताते हुए शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को आधारभूत ढांचा माना गया
इसके अलावा संविधान की सर्वोच्चता, संसदीय प्रणाली, न्याय तक पहुंच, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता इत्यादि ऐसे तत्व है जो न्यायपालिका के विभिन्न निर्णयों के आधार पर आधारभूत ढाँचा के तहत माने जाते है ।
भारतीय संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत का महत्व
संरचना का सिद्धांत स्वयं में ही एक जीवंत संविधान का उदाहरण है। संविधान में इस अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। यह एक ऐसा विचार है जो न्यायिक व्याख्याओं से जन्मा है। विगत तीन दशकों के दौरान बुनियादी संरचना के सिद्धांत को व्यापक स्वीकृति मिली है। सभी जीवंत संविधान बहस, तर्क-वितर्क, प्रतिस्पर्द्धा और व्यावहारिक राजनीति की प्रक्रिया से गुजर कर ही विकसित होते हैं।
- इस सिद्धांत द्वारा भारतीय संविधान निर्माताओं के आदर्शों, दर्शन को सुरक्षित करने का प्रयास किया गया।
- संविधान के मूल स्वरूप को अमरत्व जैसी स्थिति प्रदान करने में सहायक।
- भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं जनमानस के विकास हेतु अति आवश्यक।
- मूल ढांचे संबंधी प्रावधानों को संविधान में संशोधन के द्वारा भी नहीं हटाया जा सकता।
- संविधान संशोधन की संसद की असीमित शक्ति पर रोक लगी।
- मूल ढांचे संबंधी प्रावधानों द्वारा सरकार के मनमानी पर नियंत्रण की व्यवस्था।
- अपरिभाषित और निराकार स्वरूप जिसका विकास न्यायपालिका द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों से हुआ।
- इस सिद्धांत द्वारा न्यायपालिका संविधान संरक्षक के रूप में मजबूती से स्थापित हुई।
- इसके द्वारा न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे को विस्तार मिला।
- नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा में सहयोगी।
- भारतीय लोकतंत्र के तीनों अंगों के बीच संतुलन स्थापित करने का कार्य।
इस प्रकार इस सिद्धांत ने संविधान की नींव को मजबूत किया है तथा भविष्य में होने वाले किसी भी ऐसे संशोधन को न्यायालय द्वारा अमान्य किया जा सकता है जो इसकी मूल संरचना के विरुद्ध हो।
भारतीय संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत का प्रभाव
1973 के बाद न्यायालयों ने कई मामलों में बुनियादी संरचना के तत्वों को निर्धारित करने का प्रयास किया है। एक अर्थ में, बुनियादी संरचना के सिद्धांत से संविधान की कठोरता और लचीलेपन का संतुलन और मजबूत ही हुआ है। संविधान के कुछ हिस्सों को संशोधन के दायरे से बाहर रखने और उसके कुछ हिस्सों को संशोधन प्रक्रिया के अंतर्गत लाने से कठोरता और लचीलेपन का संतुलन निश्चय ही पुष्ट हुआ है।
न्यायपालिका द्वारा मूल ढांचे के सिद्धांत से भारतीय लोकतंत्र व्यवस्था के मूल स्वरूप को गारंटी मिली तथा संसद के मनमाने ढंग से संविधान संशोधन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगी। इसी क्रम में न्यायपालिका की शक्ति को और मजबूती मिली जैसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को न्यायपालिका द्वारा असंवैधानिक करार देकर इसे मूल ढांचे के विरुद्ध बताकर रद्द किया गया।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में स्पष्ट है कि संविधान के आधारभूत ढाँचे के सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारण है जो विधायिका की संविधान संशोधन की शक्ति को नियंत्रित कर विधायिका की निरंकुशता से बचाता है और लोकतंत्र के आधार को सुदृढ़ करता है।